राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग-२)
- Dr.Madhavi Srivastava

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अपडेट करने की तारीख: 17 फ़र॰
राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग-२)
भरत के द्वारा राम की पादुका को अपने शिर पर धारण करके अयोध्या वापस जाने के पश्चात्, राम का मन अब चित्रकूट में नहीं लग रहा था। कदाचित अब चित्रकूट में भरत और माता की अनुपस्थिति उन्हें भाव-विभोर कर रही थी। अतः उन्होंने वह स्थान त्यागने का निश्चय किया।चित्रकूट से निकलने के पश्चात राम अत्री ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। अत्री ऋषि ने उन्हें दण्डकारण्य में प्रवेश के पूर्व सावधान करते हुए कहा—
"राम यह दण्डकारण्य अनेक मायावी राक्षसों से भरा हुआ है। यह प्रदेश रावण के अधिकार क्षेत्र में आता है। उसने यह प्रदेश अपने चचेरे भाइयों खर और दूषण को दे रखा है। यहां के निवासी खर-दूषण के अत्याचारों से अत्यधिक ग्रसित हैं। वह यहां के वन में रहने वाले ऋषियों और मुनियों पर अनेकानेक अत्याचार करते हैं और यज्ञादि में बाधा उत्तपन्न करते हैं।" जब राम ऋषि अत्रि से दानवों के अत्याचार के विषय में सुनते हैं तो वह ऋषि को आश्वस्त करते हैं—"आप चिंता न करें ऋषिवर आपके आशीर्वाद से मैं समस्त आर्यावर्त को दुष्टों और पापियों से मुक्त कर दूंगा। बस आप जैसे महान ऋषियों और गुरुओं का आशीर्वाद सदैव मेरे साथ बना रहे।"
ऋषि अत्रि दशरथ नंदन राम को आशीर्वाद देते हैं। माता अनुसूया राजकुमारी सीता को दैवीय वस्त्राभूषण और कभी न मुरझाने वाली पुष्प माला प्रदान करती हैं।जब राम दंडकारण्य में प्रवेश करते हैं, तो उनकी भेंट क्षणभंग और सुतीक्ष्ण नामक मुनियों से होती है। वे दोनों ऋषि अपनी व्यथा राम से कहने में अपने आप को रोक नहीं पाते। तभी श्री राम लक्ष्मण को वहीं पंचवटी में अपनी कुटिया बनाने का आदेश देते हैं—"लक्ष्मण मैंने निश्चय किया है कि हम कुछ वर्ष यहां रहकर, यहां के निवासियों और ऋषि मुनियों को राक्षसों के आतंक से मुक्त करेंगे।"जानकी भी राम के निर्णय से सहमत होती हैं
—"रघुनंदन! मैं आप के इस निर्णय से सहमत हूं। इन भोले-भाले वनवासी और धार्मिक कृत्य करने वाले ऋषियों के समुदाय की वेदना मुझसे देखी नहीं जाती। चित्रकूट से विदा लेते समय माता अनुसूया ने भी मुझसे कहा था कि रघुनंदन किसी विशेष कार्य के लिए ही वन में निवास कर रहे हैं, मैं उस उद्देश्य को भलीभांति देख पा रही हूं। आर्य! आप अवश्य ही इन दुष्ट राक्षसों का संहार कर, इस धरती को भार मुक्त करें।"लक्ष्मण वन से बांस और छप्पर के लिए सूखी घास-पत्ती बीन कर लाते हैं और जानकी वहां की स्त्रियों की सहायता से रसोई की तैयारी करती हैं। सायं तक कुटिया बन कर तैयार हो जाती है। ब्रह्मगिरी पर्वत से निकलती हुई गोदावरी नदी में डूबता हुआ सूर्य ऐसा लग रहा था मानों वह कह रहा हो कि अब शीघ्र ही नया सवेरा होने वाला है।जानकी माता गोदावरी से आशीर्वाद लेकर उनके जल से राम के चरणों को धोती हैं और फिर तीनों कुटिया में प्रवेश करते हैं भोजन के पश्चात लक्ष्मण अपना धनुष उठा कर कहते हैं—
"भैया मैं बाहर दृष्टि रखता हूं आप विश्राम करें।""परंतु लक्ष्मण तुम भी तनिक विश्राम कर लेते।""नहीं भैया, यह जंगल चित्रकूट से भी अधिक भयावह है। यहां तो सदैव सचेत रहना पड़ेगा, न जाने कौन राक्षस कब कहां से आ जाय। आपने सुना नहीं सुतीक्ष्ण मुनि ने क्या कहा?"तभी सुतीक्ष्ण मुनि कुटिया में प्रवेश करते हैं। लक्ष्मण हाथ जोड़ कर कहते हैं—"प्रणाम मुनिवर, कहिए कैसे आना हुआ?""लक्ष्मण! मैं प्रभु राम से कुछ वार्ता के उद्देश्य से आया हूं।""आए मुनीवर", रघुनंदन राम खड़े होकर अभिवादन करते हैं। और उन्हें बैठने का स्थान देते हैं।"राम, मैं जानता हूं, आप पराक्रमी हैं, निःसंदेह आप समस्त राक्षसों का नाश कर देंगे, परंतु फिर भी मैं यह कहूंगा कि यहां के राक्षस मायावी हैं, इनका सामना करने के लिए हमें अपने शस्त्रों का विस्तार करना पड़ेगा। इसके लिए मेरा सुझाव है कि आप ऋषि अगस्त्य से अवश्य भेंट करें, वह अवश्य ही इस विषय में आपका उचित मार्ग दर्शन करेंगे।" "अवश्य मुनीवर, यह तो मेरा सौभाग्य है। मैं अवश्य ही उनसे भेंट करूंगा।"

पंचवटी का सौंदर्य देख कर सीता अति प्रसन्न होती हैं। वह प्रातः ही उठ कर गोदावरी नदी में स्नान के लिए जाती हैं। मार्ग में कई प्रकार के वृक्ष का दर्शन करती हैं, जैसे- बरगद, पीपल, अशोक, बिल्व और आमलकी। वह इन दिव्य वट वृक्षों को प्रणाम करती हैं। राम के लिए पूजा सामग्री के रूप में कुछ पुष्प और बिल्व के पत्रों को तोड़ती हैं, और वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए कुटिया में वापस आ जाती।
एक दिन उन्होंने देखा कि वहां कुटिया के बाहर कोई विशालकाय वृद्ध पक्षी विद्यमान है, जानकी उसे देख कर तनिक भयभीत हो जाती हैं। लक्ष्मण धनुष की प्रत्यंचा खींच लेते हैं। तभी वह वृद्ध पंक्षी एक गंभीर स्वर में कहता है—"प्रणाम दशरथनंदन राम!" यह सुनकर राम नेत्रों से लक्ष्मण को संकेत देते हैं। लक्ष्मण अपना धनुष नीचे कर देता हैं।"मैं तुम्हारा मित्र हूं, शत्रु नहीं। तुम्हारे पिता और मैं एक बहुत अच्छे मित्र थे।"राम हाथ जोड़ कर उस वृद्ध पंक्षी को प्रणाम करते हैं।"यदि आप मेरे पिता के मित्र हैं तो मेरे लिए आप पिता के ही समान आदरणीय हैं।"लक्ष्मण हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं।"परंतु भैया, यह किसी राक्षस की चाल भी हो सकती है।"वह वृद्ध पंक्षी हाथ जोड़ कर कहते हैं—"नहीं सुमित्रानंदन, मैं सच कह रहा हूं। आपके पिता इसी स्थान पर शब्दभेदी बाण का अभ्यास करने के लिए यहां आया करते थे। एक दिन यहीं बरगद वृक्ष के नीचे वह ध्यानस्थ हो गए, तभी राक्षसों का एक समुह इधर से निकल रहा था।
वह तुम्हारे पिता को एकांत में देख कर उनपर आक्रमण करने के उद्देश्य से आगे बढ़ा। मैं उस समय यहीं पर था, इस प्रकार किसी ध्यानस्थ और शस्त्रहीन व्यक्ति पर बिना किसी चेतावनी के आक्रमण करता देख मैं यहीं रुक गया और उन राक्षसों के साथ युद्ध किया। तभी कोलाहल सुनकर तुम्हारे पिता का ध्यान भंग हो जाता हैं और वह सचेत हो जाते हैं और शीघ्र ही समस्त राक्षसों का वध कर देते हैं। इसी स्थान पर तुम्हारे पिता दशरथ ने मुझे आजीवन मित्र बने रहने का वचन दिया था।"राम हाथ जोड़ कर पूछते हैं—"कृपया आप अपना परिचय दें।""मैं अरुण का पुत्र और संपाती का भाई जटायु हूं।"मैं वचन देता हूं, जब तक आप यहां रहेंगे, मैं आप लोगों की रक्षा करूंगा और आपकी अनुपस्थिति में पुत्री जानकी का ध्यान भी रखूंगा।क्रमश:



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