top of page
Blog


श्रीकृष्ण विग्रह में अवतारों का विलय और पृथ्वी पर आगमन
जब समस्त देवताओं ने यह अद्भुत दृश्य देखा कि वैकुण्ठाधिपति नारायण, नृसिंह, राम, यज्ञनारायण तथा अन्य सभी दिव्य अवतार भगवान श्रीकृष्ण के श्रीविग्रह में विलीन हो गए, तब उनका समस्त संशय नष्ट हो गया। वे समझ गए कि श्रीकृष्ण ही परम सत्य, परम कारण और समस्त अवतारों के मूल हैं।
इस अनुभूति से अभिभूत होकर उन्होंने विनम्रतापूर्वक भगवान की स्तुति की—
देवताओं ने कहा—“हे प्रभो! आप योगियों के लिए अगाध, अगम्य और परम तेजस्वरूप हैं, जिन्हें केवल समाधि में ही अनुभव किया जा सकता है। किन्तु

Dr.Madhavi Srivastava
27 मार्च4 मिनट पठन


श्री गोलोकधाम का अद्भुत दर्शन | ब्रह्मादि देवों की दिव्य यात्रा (श्री गर्ग-संहिता)
जब शास्त्र केवल कथाएँ नहीं रहते, बल्कि स्वयं अनुभव बन जाते हैं—तब वे हृदय को छूते ही नहीं, उसे रूपान्तरित कर देते हैं। श्रीगर्ग-संहिता का यह द्वितीय अध्याय हमें उसी दिव्य अनुभूति के द्वार पर ले आता है, जहाँ तर्क की सीमा समाप्त हो जाती है और भक्ति का आलोक प्रारम्भ होता है।
यहाँ वर्णित गोलोकधाम कोई कल्पना नहीं, बल्कि उस परम चेतना का प्रतीक है जहाँ प्रेम ही तत्त्व है, आनन्द ही स्वभाव है और श्रीकृष्ण ही सर्वस्व हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव जैसे देवताओं का भी जिस धाम में प्रवेश वि

Dr.Madhavi Srivastava
21 मार्च4 मिनट पठन


क्यों श्रीकृष्ण हैं परिपूर्णतम अवतार?| अवतारों का दिव्य रहस्य (गर्गसंहिता)
श्रीगर्ग-संहिता का गोलोकखण्ड भगवान् श्रीकृष्ण की परम दिव्य महिमा, उनके अद्वितीय स्वरूप तथा उनके अवतारों के रहस्य का अत्यन्त सूक्ष्म एवं आध्यात्मिक निरूपण प्रस्तुत करता है। यह ग्रन्थ केवल कथा नहीं, बल्कि भक्ति, तत्त्वज्ञान और दिव्य अनुभूति का संगम है।
प्रथम अध्याय में शौनक, गर्ग, नारद तथा राजा बहुलाश्व के संवाद के माध्यम से यह बताया गया है कि भगवान् किस प्रकार अपनी योगमाया से अवतार धारण करते हैं तथा उनके अवतारों के भेद क्या हैं। यह अध्याय साधक के भीतर श्रद्धा, जिज्ञासा और भक्

Dr.Madhavi Srivastava
20 मार्च4 मिनट पठन


भारतीय भक्ति परंपरा : एक जीवित दर्शन
भारतीय भक्ति परंपरा को केवल भावुक भक्ति या काव्यात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता। यह मध्यकालीन भारत में उदित एक क्रांतिकारी आध्यात्मिक आंदोलन था, जिसने उस समय के दार्शनिक, सामाजिक और धार्मिक वातावरण को गहराई से प्रभावित किया।
बारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच विकसित इस आंदोलन ने कठोर कर्मकांडों की अनिवार्यता को चुनौती दी, जाति-व्यवस्था की ऊँच-नीच पर प्रश्न उठाया, और आध्यात्मिक साधना को केवल बौद्धिक चिंतन से हटाकर प्रत्यक्ष अनुभव और अंतर्मन की अनुभूति की ओर मोड़ दि

Dr.Madhavi Srivastava
7 मार्च9 मिनट पठन


“जासु नाम जपि सुनहु भवानी…” – रामनाम की महिमा
यह चौपाई रामचरितमानस के सुंदरकांड में आती है, जिसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास ने की। चौपाई इस प्रकार है —
सुंदरकांड में जब हनुमान माता सीता की खोज करते हुए लंका पहुँचते हैं, तब वे अशोक वाटिका उजाड़ देते हैं और राक्षसों का संहार करते हैं। अंततः उन्हें रावण की सभा में बाँधकर लाया जाता है।
उसी समय भगवान शिव, माता पार्वती (भवानी) से यह रहस्य बताते हैं —
“हे भवानी! जिन प्रभु राम का नाम जपकर ज्ञानीजन संसार के बंधनों को काट देते हैं, उनके दूत हनुमान क्या सचमुच बंध सकते हैं? वे तो केवल

Dr.Madhavi Srivastava
28 फ़र॰5 मिनट पठन


प्रभुजी तुम चंदन हम पानी: संत रैदास की वाणी
रैदास जी प्रतिदिन प्रातः लगभग 3 बजे, वह पवित्र स्नान के लिए गंगा नदी में जाते थे। एक दिन, स्नान करते समय, उन्हें नदी की रेत में एक चिकना, गोल पत्थर मिला। उसकी सुंदरता देखकर, उन्हें उसमें एक दिव्य उपस्थिति का आभास हुआ और वे उसे ईश्वर का स्वरूप मानकर घर ले आए।उन्होंने एक नीम के पेड़ के नीचे एक छोटी सी झोपड़ी बनाई, उस पत्थर को श्रद्धापूर्वक उसमें रखा, और प्रतिदिन अत्यंत भक्तिभाव से उसकी पूजा करने लगे। भक्ति में लीन होकर, वे अक्सर गाया करते थे--
"प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाके अं

Dr.Madhavi Srivastava
14 फ़र॰5 मिनट पठन


राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग -3)
"नहीं, राम दोषी मैं हूं" जटायु कष्ट से कहराते हुए कहता है। "मैंने उस दुष्ट रावण से जानकी को बचाने का बहुत प्रयास किया परंतु सफल न हो सका, वह धूर्त शूर्पनखा का भाई है और लंका में निवास करता है। वह जानकी को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।" यह कहते ही जटायु के प्राण निकल जाते हैं। राम उसका अन्तिम संस्कार उसी तरह करते है जैसे एक पुत्र अपने पिता का करता है। अपने पिता की मृत्यु की समय वह अयोध्या में नहीं थे, अतः राम जटायु की अंतिमक्रिया एक पुत्र की भांति ही कर अपने उस अधूरे कार्य को प

Dr.Madhavi Srivastava
8 फ़र॰4 मिनट पठन


राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग-२)
भरत के द्वारा राम की पादुका को अपने शिर पर धारण करके अयोध्या वापस जाने के पश्चात्, राम का मन अब चित्रकूट में नहीं लग रहा था। कदाचित अब चित्रकूट में भरत और माता की अनुपस्थिति उन्हें भाव-विभोर कर रही थी। अतः उन्होंने वह स्थान त्यागने का निश्चय किया।चित्रकूट से निकलने के पश्चात राम अत्री ऋषि के आश्रम पहुंचते हैं। अत्री ऋषि ने उन्हें दण्डकारण्य में प्रवेश के पूर्व सावधान करते हुए कहा—"राम यह दण्डकारण्य अनेक मायावी राक्षसों से भरा हुआ है। यह प्रदेश रावण के अधिकार क्षेत्र में आता ह

Dr.Madhavi Srivastava
7 फ़र॰4 मिनट पठन


राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम
पंचवटी वह स्थान है,जहां राम का जीवन एक भयंकर करवट लेता है, जहाँ राम राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनते हैं।यही वह स्थान है जहां काल चक्र अपना खेल खेलता है। ऐसा लगता है जैसे काल और महाकाल दोनों ही यहां मंचन कर रहे हो। काल चाह कर भी उस घटना को परिवर्तित नहीं कर सकता था, वहीं महाकाल का हृदय इन सब घटनाओं को देख कर राम की वंदना करने के लिए विवश हो उठता है। इधर राम सीता के वियोग में अश्रुओं के साथ महाकाल का स्मरण करते हैं, वहीं महाकाल भी समय और प्रारब्ध की विडंबना से विवश

Dr.Madhavi Srivastava
6 फ़र॰4 मिनट पठन


असंभव को संभव कैसे बनाएं: राम सेतु की प्रेरक कहानी
"असंभव को संभव कैसे बनाएं: राम सेतु की प्रेरक कहानी"-जहां विश्वास और भक्ति ने असंभव को संभव कर दिया।यह प्रेरणादायक कथा आपकी चुनौतियों को पार करने में मदद करेगी।

Dr.Madhavi Srivastava
16 मार्च 20257 मिनट पठन


श्री राम पंचरत्न स्तोत्रम्-महत्व, अर्थ और लाभ
श्री राम पंचरत्न स्तोत्रम् एक प्राचीन और दिव्य भक्ति स्तोत्र है, जिसे महान आद्य शंकराचार्य द्वारा रचित माना जाता है। यह स्तोत्र भगवान राम के

Dr.Madhavi Srivastava
18 सित॰ 20244 मिनट पठन
bottom of page