क्यों श्रीकृष्ण हैं परिपूर्णतम अवतार?| अवतारों का दिव्य रहस्य (गर्गसंहिता)
- Dr.Madhavi Srivastava

- 20 मार्च
- 4 मिनट पठन
अपडेट करने की तारीख: 21 मार्च
श्रीगर्ग-संहिता का गोलोकखण्ड भगवान् श्रीकृष्ण की परम दिव्य महिमा, उनके अद्वितीय स्वरूप तथा उनके अवतारों के रहस्य का अत्यन्त सूक्ष्म एवं आध्यात्मिक निरूपण प्रस्तुत करता है। यह ग्रन्थ केवल कथा नहीं, बल्कि भक्ति, तत्त्वज्ञान और दिव्य अनुभूति का संगम है।
प्रथम अध्याय में शौनक, गर्ग, नारद तथा राजा बहुलाश्व के संवाद के माध्यम से यह बताया गया है कि भगवान् किस प्रकार अपनी योगमाया से अवतार धारण करते हैं तथा उनके अवतारों के भेद क्या हैं। यह अध्याय साधक के भीतर श्रद्धा, जिज्ञासा और भक्ति की ज्योति प्रज्वलित करता है।
क्यों श्रीकृष्ण हैं परिपूर्णतम अवतार?| अवतारों का दिव्य रहस्य (गर्गसंहिता)
क्यों श्रीकृष्ण हैं परिपूर्णतम अवतार?| अवतारों का दिव्य रहस्य (गर्गसंहिता) का अन्वेषण करें और जानें श्रीकृष्ण की अद्वितीय महिमा।
शौनक-गर्ग-संवाद
मंगलाचरण
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
शरविकचपङ्कजश्रियमतीवविद्वेषकं मिलिन्दमुनिसेवितं कुलिशकंजचिह्नावृतम्।
स्फुरत्कनकनूपुरं दलितभक्ततापत्रयं चलद्युतिपदद्वयं हृदि दधामि राधापतेः ॥
वदनकमलनिर्यद् यस्य पीयूषमाद्यं पिबति जनवरोऽयं पातु सोऽयं गिरं मे।
बदरवनविहारः सत्यवत्याः कुमारः प्रणतदुरितहारः शाधन्वावतारः ॥

भगवान् नारायण, श्रेष्ठ पुरुष नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि व्यास को नमस्कार करके, भगवान् की विजयगाथा का वर्णन करना चाहिए।
मैं श्रीराधापति भगवान् के उन दिव्य युगल चरणकमलों को अपने हृदय में धारण करता हूँ—
जो शरद् ऋतु के खिले हुए कमलों की शोभा को भी मात देते हैं,
जिनकी सेवा मुनिरूपी भ्रमर निरन्तर करते रहते हैं,
जो वज्र एवं कमल आदि चिन्हों से सुशोभित हैं,
जिनमें स्वर्णमय नूपुर झिलमिलाते हैं,
और जो भक्तों के त्रिविध ताप (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) का नाश करते हैं।
मैं उन श्रीव्यासजी की वाणी का स्मरण करता हूँ—
जिनके मुखकमल से अमृतमयी कथा प्रवाहित होती है,
जो बदरिकाश्रम में विहार करते हैं,
जो प्रणतजनों के पापों का नाश करते हैं।
नैमिषारण्य में गर्गजी का आगमन
एक समय परम तेजस्वी, योगशास्त्र के महान आचार्य मुनिवर गर्गजी, शौनक ऋषि से मिलने के लिए नैमिषारण्य आए।
उनके आगमन पर शौनकजी और अन्य मुनियों ने—
आदरपूर्वक उठकर उनका स्वागत किया,
पाद्य आदि से विधिपूर्वक पूजन किया।
शौनकजी की जिज्ञासा
शौनकजी ने विनम्रतापूर्वक कहा—“साधु पुरुषों का भ्रमण अत्यन्त कल्याणकारी होता है, क्योंकि वे गृहस्थों के जीवन में शान्ति लाते हैं।
हे भगवन्! मेरे मन में यह प्रश्न उत्पन्न हुआ है कि—भगवान् के अवतार कितने प्रकार के होते हैं?”
गर्गजी का उत्तर
गर्गजी ने कहा—“आपका यह प्रश्न अत्यन्त उत्तम है। यह प्रश्न सुनने, पूछने और बताने वाले—तीनों का कल्याण करता है।”
इसके उत्तर में उन्होंने एक प्राचीन कथा सुनाई।
राजा बहुलाश्व और नारदजी का संवाद
मिथिला में बहुलाश्व नामक एक महान राजा राज्य करते थे—
वे भगवान् श्रीकृष्ण के परम भक्त,
शान्त और अहंकाररहित थे।
एक दिन देवर्षि नारद उनके यहाँ पधारे।
राजा ने उनका आदरपूर्वक स्वागत कर पूछा—“जो भगवान् सर्वव्यापक, अनादि और प्रकृति से परे हैं, वे शरीर धारण कैसे करते हैं?”
नारदजी का उत्तर — अवतार का रहस्य
नारदजी बोले—
भगवान् गौ, ब्राह्मण, देवता, साधु और वेदों की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
उनका शरीर सामान्य (प्राकृत) नहीं, बल्कि चिन्मय (दिव्य) होता है।
वे अपनी योगमाया से शरीर धारण करते हुए भी सर्वव्यापक बने रहते हैं।
जैसे अभिनेता अभिनय करता है परन्तु उसमें आसक्त नहीं होता, वैसे ही भगवान् अपनी लीला में स्थित रहते हुए भी माया से परे रहते हैं।
भगवान् के अवतारों के छह भेद
अंशांशोंऽशस्तथाऽऽवेशः कला पूर्णः प्रकथ्यते। व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम् ॥
अंशांशस्तु मरीच्यादिरंशा ब्रह्मादयस्तथा ।कलाः कपिलकूर्माद्या आवेशा भार्गवादयः ॥
पूर्णो नृसिंहो रामश्च वेतद्वीपाधिपो हरिः । वैकुण्ठोऽपि तथा यज्ञो नरनारायणः स्मृतः ॥
परिपूर्णतमः साक्षाच्छ्रीकृष्णो भगवान् स्वयम्। असंख्यब्रह्माण्डपतिगलोके धानि राजते ॥
कार्याधिकारं कुर्वन्तः सदंशास्ते प्रकीर्तिताः। तत्कार्यभारं कुर्वन्तस्तेंऽशांशा विदिताः प्रभोः ॥
नारदजी ने बताया कि भगवान् के अवतार छः प्रकार के होते हैं—
1. अंशांश अवतार
जो भगवान् के अंश के भी अंश होते हैं
उदाहरण: मरीचि आदि
2. अंश अवतार
जो सृष्टि के संचालन का कार्य करते हैं
उदाहरण: ब्रह्मा आदि
3. आवेश अवतार
जिनमें भगवान् विशेष शक्ति का आवेश करते हैं
उदाहरण: परशुराम
4. कला अवतार
जो युग-धर्म की स्थापना करते हैं
उदाहरण: कपिल, कूर्म आदि
5. पूर्ण अवतार
जिनमें भगवान् की पूर्ण शक्तियाँ प्रकट होती हैं
उदाहरण:
नृसिंह
श्रीराम
नर-नारायण
यज्ञ, वैकुण्ठ आदि
6. परिपूर्णतम अवतार
जिनमें समस्त शक्तियाँ पूर्ण रूप से समाहित होती हैं
साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण
परिपूर्णतम श्रीकृष्ण का महत्त्व
श्रीकृष्ण ही एकमात्र परिपूर्णतम अवतार हैं
वे अनन्त ब्रह्माण्डों के स्वामी हैं
गोलोकधाम में उनका परम दिव्य निवास है
उनके अवतार का उद्देश्य केवल एक कार्य नहीं, बल्कि अनगिनत दिव्य कार्यों का सम्पादन होता है।
राजा बहुलाश्व की उत्कंठा
यह सुनकर राजा भावविभोर हो गए—
उनके शरीर में रोमांच हो आया
आँखों में प्रेमाश्रु भर आए
उन्होंने पूछा—"जो भगवान् गोलोक में स्थित हैं, वे पृथ्वी पर द्वारका में निवास करते हैं? जो सम्पूर्ण देवताओं के लिए दुर्लभ हैं, वह परमब्रह्म परमात्मा आदि देव भगवान श्रीकृष्ण मेरे नेत्रों के समक्ष कैसे आएँगे।"
नारदजी का आश्वासन
नारदजी बोले—“हे राजन्! तुम अत्यन्त भाग्यशाली हो। भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे दर्शन के लिए अवश्य आएँगे।”
अध्याय का सार
इस अध्याय में हमें यह शिक्षाएँ मिलती हैं—
भगवान् अपनी लीला से अवतार धारण करते हैं ।
उनका स्वरूप दिव्य और चिन्मय है।
अवतारों के विभिन्न स्तर हैं, परन्तु श्रीकृष्ण ही परम परिपूर्णतम हैं।
उपसंहार
इस प्रकार श्रीगर्ग-संहिता के गोलोकखण्ड के प्रथम अध्याय में—नारद और बहुलाश्व के संवाद द्वारा श्रीकृष्ण की महिमा और अवतारों के भेद का दिव्य वर्णन पूर्ण हुआ।



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