रैदास जी प्रतिदिन प्रातः लगभग 3 बजे, वह पवित्र स्नान के लिए गंगा नदी में जाते थे। एक दिन, स्नान करते समय, उन्हें नदी की रेत में एक चिकना, गोल पत्थर मिला। उसकी सुंदरता देखकर, उन्हें उसमें एक दिव्य उपस्थिति का आभास हुआ और वे उसे ईश्वर का स्वरूप मानकर घर ले आए।उन्होंने एक नीम के पेड़ के नीचे एक छोटी सी झोपड़ी बनाई, उस पत्थर को श्रद्धापूर्वक उसमें रखा, और प्रतिदिन अत्यंत भक्तिभाव से उसकी पूजा करने लगे। भक्ति में लीन होकर, वे अक्सर गाया करते थे--
"प्रभुजी तुम चंदन हम पानी, जाके अं
आज की सबसे बड़ी समस्या 'परिणाम की चिंता' (Anxiety of Results) और 'अहंकार' (The Ego of Doership) है। हम काम इसलिए नहीं करते कि वह हमारा कर्तव्य है, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि हमें उससे कुछ चाहिए—नाम, पैसा या फेम। और जब नतीजा वैसा नहीं मिलता जैसा हमने सोचा था, तो हम टूट जाते हैं। हम 'पाप' या गलतियों के डर से इतने सहमे रहते हैं कि कठिन फैसले लेने से कतराते हैं। हम दुनिया के 'पानी' में पूरी तरह भीग चुके हैं, यानी सांसारिक तनाव हमारे भीतर तक समा गया है।
आज कई साधक स्वयं से पूछते हैं, "मैं ध्यान कैसे करूँ?" मन बेचैनी से भटकता रहता है, एक विचार से दूसरे विचार में भागता रहता है, चिंताओं, स्मृतियों या इच्छाओं से चिपका रहता है। वेदों से लेकर भगवद्गीता तक, युगों-युगों से शास्त्र एक सरल किन्तु गहन उत्तर देते हैं: ईश्वर का ध्यान करो। मन को ईश्वर पर स्थिर करने से असंभव भी संभव हो जाता है और अप्राप्य भी साध्य हो जाता है। इस अभ्यास को रूप-ध्यान, या ईश्वर के स्वरूप का ध्यान कहते हैं।
पवित्र ग्रंथों के परिदृश्य में, एक शिक्षा अत्यंत स्पष
जटायु का अंतिम संस्कार करने के पश्चात् राम और लक्ष्मण आगे बढ़ते हैं जहां पंपा नदी के समीप ऋषि मतंग का एक सुन्दर और अलौकिक आश्रम पड़ता है। वहीं पर शबरी नाम की स्त्री एक अलग कुटिया बना कर निवास करती थी। शबरी भीलों के राजा की कन्या थी। वह अपने गुरु मतंग के साथ ही रहा करती थीं और उन्हीं से धर्म और शास्त्रों के ज्ञान को ग्रहण कर उनके प्रिय शिष्यों में से एक हो गईं थी। एक दिन जब ऋषि मतंग का निर्वाण का समय निकट था, शबरी कहने लगी—"गुरुदेव मुझे किसके सहारे छोड़ कर जा रहे, मुझे भी अपने
"नहीं, राम दोषी मैं हूं" जटायु कष्ट से कहराते हुए कहता है। "मैंने उस दुष्ट रावण से जानकी को बचाने का बहुत प्रयास किया परंतु सफल न हो सका, वह धूर्त शूर्पनखा का भाई है और लंका में निवास करता है। वह जानकी को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।" यह कहते ही जटायु के प्राण निकल जाते हैं। राम उसका अन्तिम संस्कार उसी तरह करते है जैसे एक पुत्र अपने पिता का करता है। अपने पिता की मृत्यु की समय वह अयोध्या में नहीं थे, अतः राम जटायु की अंतिमक्रिया एक पुत्र की भांति ही कर अपने उस अधूरे कार्य को प
8 फ़र॰4 मिनट पठन
The ultimate reality, that is the truth.
― Bhagavad Gita, Chapter 17, Verse 23
Hi there!
We are passionate about promoting mental well-being by sharing insights, experiences, and information that inspire positivity and balance. Through our platform, we aim to provide thoughtful resources and support to enhance your journey toward a healthier, happier mind.