“नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः”भक्ति में समता का सिद्धांत
- Dr.Madhavi Srivastava

- 15 मार्च
- 5 मिनट पठन
“नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः” नारद भक्ति सूत्र (72)
यह उक्ति एक अत्यंत व्यापक और आध्यात्मिक रूप से रूपांतरकारी सत्य को उद्घाटित करती है कि सच्चे भक्तों के मध्य जाति, ज्ञान, रूप, कुल, धन अथवा सामाजिक कर्म के आधार पर कोई भेद नहीं रहता।

भक्ति, अपनी शुद्धतम धार्मिक अभिव्यक्ति में, उन सभी अनुभवजन्य ऊँच-नीच को निरस्त कर देती है, जो सामान्यतः सामाजिक पहचान को नियंत्रित करती हैं। सूत्रकार विशेष रूप से इस तथ्य पर बल देते हैं कि भक्ति ब्राह्मण को शूद्र से, शिक्षित को अशिक्षित से, सुंदर को असुंदर से, संपन्न को निर्धन से अथवा समर्थ को असहाय से अधिक महत्त्व नहीं देती। भक्ति का एकमात्र मानदंड है—हृदय का पूर्ण समर्पण, अर्थात् चेतना का भगवान के चरणों में अखंड अर्पण।
“नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः”भक्ति में समता का सिद्धांत
“नास्ति तेषु जातिविद्यारूपकुलधनक्रियादिभेदः”भक्ति में समता का सिद्धांत जानें। इस आध्यात्मिक सत्य की गहराई को समझें।
भक्ति-दृष्टि में आध्यात्मिक सिद्धि कोई सामाजिक उपलब्धि नहीं, अपितु आंतरिक आत्मनिवेदन की परिणति है। जो साधक अपने समस्त अस्तित्व को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है, जो निरंतर प्रेमपूर्वक उनका स्मरण करता है, और जिसका मन दिव्य चिंतन में निमग्न हो जाता है, वही भक्ति रूपी दुर्लभ रत्न का अधिकारी बनता है। इतिहास और पवित्र आख्यानों में ऐसे अनेक प्रेरणादायक उदाहरण उपलब्ध हैं, जो इस सत्य की पुष्टि करते हैं। निम्नकुल में जन्मे निषाद, कसाई सदन, सरल हृदया शबरी, तथाकथित राक्षस विभीषण, निर्धन विदुर और सुदामा, तथा सरल स्वभाव की गोपियाँ और हनुमान—इन सभी ने भक्ति और पूर्ण समर्पण के प्रभाव से सामाजिक सीमाओं का अतिक्रमण किया। भक्ति और प्रपत्ति के बल पर ये सभी ईश्वर की कृपा के पात्र बने और उनके परम प्रिय सिद्ध हुए।
श्रीरामचरितमानसमें कही गयी है—
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता । सोइ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता ॥ नीति निपुन सोइ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥ सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥ कह रघुपति सुनु भामिनि बाता । मानउँ एक भगति कर नाता ॥ जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई । धन बल परिजन गुन चतुराई ॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥
इस आध्यात्मिक सार्वभौमिकता की काव्यात्मक पुष्टि रामचरितमानस में प्राप्त होती है। वहाँ स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सच्चा ज्ञानी, बुद्धिमान, गुणी, महान, पंडित और वीर वही है, जिसका हृदय श्रीराम के चरणों में अनुरक्त और निमग्न है। गोस्वामी तुलसीदास भक्ति को वंश, विद्वत्ता, नीति-कौशल अथवा सांसारिक प्रज्ञा से भी उच्च स्थान प्रदान करते हैं।
भक्ति के अभाव में, मनुष्य का व्यक्तित्व चाहे कितना ही सुसज्जित और आकर्षक क्यों न प्रतीत हो, वह भीतर से शून्य रहता है—जैसे जलविहीन मेघ केवल आकाश में घूमता हुआ दिखता है, परंतु जीवनदायिनी वर्षा देने में असमर्थ रहता है। इस काव्यात्मक धर्मदृष्टि के माध्यम से भक्ति को अनेक गुणों में से एक साधारण गुण नहीं, बल्कि उस मूल तत्त्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो समस्त गुणों को पवित्रता, अर्थ और पूर्णता प्रदान करता है।

फिर भी, आध्यात्मिक समानता के इस सिद्धांत को अनुचित रूप से नहीं समझना चाहिए। ग्रंथ स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करता है कि भक्त अपनी आध्यात्मिक सिद्धि के आधार पर सामाजिक श्रेष्ठता का दावा नहीं करता और न ही स्थापित सामाजिक व्यवस्थाओं को समाप्त करने की माँग करता है। सच्चा भक्त अहंकार से सर्वथा मुक्त होता है; अतः वह भक्ति के नाम पर अभिमान का कोई नवीन रूप कैसे धारण कर सकता है?
भक्ति का कार्य आंतरिक ऊँच-नीच को मिटाना है, बाह्य सामाजिक संरचनाओं को अनिवार्यतः बदलना नहीं। वर्णाश्रम-धर्म की व्यवस्था और भक्ति का आंतरिक मार्ग — इन दोनों के बीच भेद बना रहता है। भक्ति हृदय की अवस्था है, जबकि वर्णाश्रम सामाजिक आचरण की व्यवस्था है। दोनों का क्षेत्र भिन्न होते हुए भी परस्पर विरोधी नहीं है।
लेखक सावधान करते हैं कि जो लोग भक्ति के नाम पर शास्त्रसम्मत मर्यादाओं को नष्ट करना चाहते हैं, वे वस्तुतः भक्ति पर ही आक्षेप लगाते हैं। अतः भक्ति-पथ पर अग्रसर साधकों को कभी भी शास्त्र, सामाजिक अनुशासन अथवा मर्यादाओं के प्रति अनादर या द्वेष की भावना नहीं रखनी चाहिए। सच्ची भक्ति विनम्रता, मर्यादा और आत्मसंयम के साथ ही शोभा पाती है।
ग्रंथ प्रारब्ध कर्म की आध्यात्मिक वास्तविकता को भी स्वीकार करता है: यदि ऐसी स्थितियाँ नियति में नहीं हैं तो व्यक्ति इस जन्म में विद्या, धन, सौंदर्य, जाति या वंश प्राप्त नहीं कर सकता है। इन कारकों को आसानी से नहीं बदला जा सकता है। हालाँकि, उनकी उपस्थिति या अनुपस्थिति कभी भी आध्यात्मिक भेदभाव का आधार नहीं बननी चाहिए। भक्ति के क्षेत्र में, जन्म या परिस्थिति के कारण किसी को भी कमतर नहीं समझना चाहिए। वैष्णव धर्मशास्त्र में, भक्तों के बीच जाति-आधारित भेद करना एक गंभीर अपराध माना जाता है।
वैष्णव शास्त्रों में भक्ति की उन्नति में बाधक चौंसठ अपराधों का उल्लेख किया गया है। इन अपराधों का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, अपितु साधक को सावधान करना है, जिससे उसकी साधना निर्मल और निष्कलुष बनी रहे। इन अपराधों में प्रमुख हैं—भगवान को अनेक देवताओं में से केवल एक देवता के रूप में मानना; वेदों को मानव-रचित ग्रंथ समझना; भक्तों के मध्य जाति-आधारित भेदभाव करना; गुरु को साधारण मनुष्य मान लेना; देवमूर्ति को मात्र जड़ पदार्थ समझना; पवित्र प्रसाद, तुलसी, गौ तथा भागवत और गीता जैसे दिव्य ग्रंथों को सांसारिक स्तर पर रखना।
इसी प्रकार, भगवान की दिव्य लीलाओं को साधारण मानवीय क्रिया के रूप में ग्रहण करना; परम दिव्य प्रेम की तुलना लौकिक काम-भोग से करना; संत-महात्माओं की निंदा करना; आध्यात्मिक अभिमान का पोषण करना; दुष्ट अथवा अधार्मिक व्यक्तियों का संग करना; धनार्जन के लिए धर्म का उपयोग करना; अपने आश्रितों, परिवारजनों अथवा निर्बलों की उपेक्षा करना; पवित्र नाम, रूप या चित्र का अनादर करना; किसी भी जीव को कष्ट पहुँचाना; तथा भगवान के युगल स्वरूप के प्रति द्वैत-बुद्धि रखना—ये सभी गंभीर अपराध माने गए हैं।
इन निर्देशों का तात्पर्य बाह्य आचारों की कठोरता स्थापित करना नहीं है, बल्कि भक्ति की पवित्रता, श्रद्धा और अंतःकरण की निर्मलता की रक्षा करना है। जब साधक इन सूक्ष्म मर्यादाओं का आदर करता है, तब उसकी भक्ति स्थिर, गहन और फलदायी बनती है।
इस प्रकार, इस सूत्र का दार्शनिक मर्म एक अत्यंत सूक्ष्म संतुलन पर आधारित है। आंतरिक स्तर पर भक्ति समस्त सामाजिक ऊँच-नीच का पूर्णतः निराकरण कर देती है; परंतु बाह्य स्तर पर वह न तो अव्यवस्था को प्रोत्साहित करती है और न ही अहंकार को स्वीकार करती है। भक्ति ईश्वर-कृपा तक पहुँच को सर्वसुलभ बनाती है, किंतु साथ ही वह विनम्रता, अनुशासन और श्रद्धा की अनिवार्य अपेक्षा भी करती है।
सच्ची भक्ति न तो सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह है और न ही केवल प्रतिष्ठा या पदानुक्रम के अनुसार आचरण करना। वह मूलतः अहंकार का पूर्ण समर्पण है। इस समर्पण की अवस्था में समस्त भेदभाव स्वतः लुप्त हो जाते हैं; तथापि विनम्रता के कारण भक्त संसार की संरचनाओं और मर्यादाओं का सम्मान करता रहता है, परंतु उनसे आसक्त या बंधित नहीं होता।
इस प्रकार, यह सूत्र एक गहन आध्यात्मिक मानव-दृष्टि का प्रतिपादन करता है। मनुष्य का मूल्य उसकी जन्मगत पहचान, कुल, जाति या सामाजिक स्थिति से निर्धारित नहीं होता, अपितु उसके प्रेम की गहराई से आँका जाता है। बाह्य उपाधियाँ क्षणभंगुर हैं, परंतु ईश्वर के प्रति समर्पित प्रेम शाश्वत और वास्तविक है।
जहाँ भगवान के प्रति निष्कलुष प्रेम विद्यमान होता है, वहीं वास्तविक महानता का निवास होता है। और जहाँ भक्ति का प्रकाश प्रस्फुटित होता है, वहाँ समस्त सद्गुण स्वयमेव प्रकाशित हो उठते हैं। भक्ति ही वह तत्त्व है जो मनुष्य को आंतरिक रूप से समृद्ध, पूर्ण और गौरवमय बनाती है।



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