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राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग -3)

अपडेट करने की तारीख: 17 फ़र॰


राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग -3)--


लक्षण अभी भी पश्चाताप कर रहे।


"भैया मुझे क्षमा कर दे, मैंने भाभी का ध्यान नहीं रखा।"


"लक्ष्मण तुम्हें स्मरण है जटायु ने क्या कहा था? उसने कहा था कि वह हमलोग की अनुपस्थित में जानकी का ध्यान रखेगा। चलो, हम जटायु की खोज करते है उसे अवश्य ही पता होगा कि जानकी कहां हैं।"


"परंतु भैया हम किस दिशा में जाए?"


मुझे वह मारीच दौड़ता हुआ उत्तर दिशा को ओर ले गया था, संभवत जानकी को कोई विपरीत दिशा में ले गया होगा। मेरा मन कहता है हमें दक्षिण दिशा की ओर चलना चाहिए, वैसे भी खर और दूषण का वध हम लोगों ने उसी दिशा को ओर किया है। संभवतः उनकी बहन शूर्पनखा पुनः आई हो और वह ही जानकी को कहीं ले गई हो। राम और लक्ष्मण आगे बढ़ते है, तभी उन्हें जटायु का करुण क्रंदन सुनाई पड़ता है।


"राम राम राम…।"


एक वृद्ध पंक्षी भूमि पर घायल अवस्था में कहरा रहा था, उसका एक पंख विक्षिप्त अवस्था में था, उसे अत्यधिक पीड़ा हो रही थी। राम उसे देखते ही दौड़ कर इसके निकट आते हैं और उसका शिर अपने गोद में रख कर दुःखी मन से पूछते है—"तात! आपको यह क्या हो गया?" जटायु राम को देखते हो रुदन करने लगता है—


"राम मैं अपना वचन पूरा न कर सका, इसके लिए मुझे क्षमा कर देना, मैं अपने मित्र दशरथ से क्या कहूंगा कि मैं अपनी प्राणों से प्रिय पुत्र-वधु की रक्षा भी नहीं कर पाया।"


"आप ऐसा क्यों कह रहे, तात?" राम चिंतित स्वर में कहते हैं। "आपने अपना पूरा प्रयास किया, दोष तो मेरा है कि मैं जानकी का ध्यान न रख सका, मैं अयोध्या वासियों से क्या कहूंगा कि मैं उनकी होने वाली महारानी की रक्षा न कर सका, मैं माताओं से क्या कहूंगा कि उनकी पुत्रवधु कहां है?"


"नहीं, राम दोषी मैं हूं" जटायु कष्ट से कहराते हुए कहता है। "मैंने उस दुष्ट रावण से जानकी को बचाने का बहुत प्रयास किया परंतु सफल न हो सका, वह धूर्त शूर्पनखा का भाई है और लंका में निवास करता है। वह जानकी को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।" यह कहते ही जटायु के प्राण निकल जाते हैं। राम उसका अन्तिम संस्कार उसी तरह करते है जैसे एक पुत्र अपने पिता का करता है। अपने पिता की मृत्यु की समय वह अयोध्या में नहीं थे, अतः राम जटायु की अंतिमक्रिया एक पुत्र की भांति ही कर अपने उस अधूरे कार्य को पूर्ण करते हैं।


राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (भाग -3)

राम को अब पता चल चुका था कि जानकी कहां है? परंतु अब कठिनाई यह थी कि रावण तक कैसे पहुंचा जाय? और जटायु जिस लंका की बात कर रहा था वह कहां है?राम क्षण भर के लिए निराश हो जाते हैं और महाकाल का स्मरण करने लगते है।"महादेव! आगे का मार्ग दिखाएं...


लक्षण अभी भी पश्चाताप कर रहे।


"भैया मुझे क्षमा कर दे, मैंने भाभी का ध्यान नहीं रखा।"


"लक्ष्मण तुम्हें स्मरण है जटायु ने क्या कहा था? उसने कहा था कि वह हमलोग की अनुपस्थित में जानकी का ध्यान रखेगा। चलो, हम जटायु की खोज करते है उसे अवश्य ही पता होगा कि जानकी कहां हैं।"


"परंतु भैया हम किस दिशा में जाए?"


मुझे वह मारीच दौड़ता हुआ उत्तर दिशा को ओर ले गया था, संभवत जानकी को कोई विपरीत दिशा में ले गया होगा। मेरा मन कहता है हमें दक्षिण दिशा की ओर चलना चाहिए, वैसे भी खर और दूषण का वध हम लोगों ने उसी दिशा को ओर किया है। संभवतः उनकी बहन शूर्पनखा पुनः आई हो और वह ही जानकी को कहीं ले गई हो। राम और लक्ष्मण आगे बढ़ते है, तभी उन्हें जटायु का करुण क्रंदन सुनाई पड़ता है।


"राम राम राम…।"


एक वृद्ध पंक्षी भूमि पर घायल अवस्था में कहरा रहा था, उसका एक पंख विक्षिप्त अवस्था में था, उसे अत्यधिक पीड़ा हो रही थी। राम उसे देखते ही दौड़ कर इसके निकट आते हैं और उसका शिर अपने गोद में रख कर दुःखी मन से पूछते है—"तात! आपको यह क्या हो गया?" जटायु राम को देखते हो रुदन करने लगता है—


"राम मैं अपना वचन पूरा न कर सका, इसके लिए मुझे क्षमा कर देना, मैं अपने मित्र दशरथ से क्या कहूंगा कि मैं अपनी प्राणों से प्रिय पुत्र-वधु की रक्षा भी नहीं कर पाया।"


"आप ऐसा क्यों कह रहे, तात?" राम चिंतित स्वर में कहते हैं। "आपने अपना पूरा प्रयास किया, दोष तो मेरा है कि मैं जानकी का ध्यान न रख सका, मैं अयोध्या वासियों से क्या कहूंगा कि मैं उनकी होने वाली महारानी की रक्षा न कर सका, मैं माताओं से क्या कहूंगा कि उनकी पुत्रवधु कहां है?"


"नहीं, राम दोषी मैं हूं" जटायु कष्ट से कहराते हुए कहता है। "मैंने उस दुष्ट रावण से जानकी को बचाने का बहुत प्रयास किया परंतु सफल न हो सका, वह धूर्त शूर्पनखा का भाई है और लंका में निवास करता है। वह जानकी को दक्षिण दिशा की ओर ले गया है।" यह कहते ही जटायु के प्राण निकल जाते हैं। राम उसका अन्तिम संस्कार उसी तरह करते है जैसे एक पुत्र अपने पिता का करता है। अपने पिता की मृत्यु की समय वह अयोध्या में नहीं थे, अतः राम जटायु की अंतिमक्रिया एक पुत्र की भांति ही कर अपने उस अधूरे कार्य को पूर्ण करते हैं।


राम को अब पता चल चुका था कि जानकी कहां है? परंतु अब कठिनाई यह थी कि रावण तक कैसे पहुंचा जाय? और जटायु जिस लंका की बात कर रहा था वह कहां है?राम क्षण भर के लिए निराश हो जाते हैं और महाकाल का स्मरण करने लगते है।"महादेव! आगे का मार्ग दिखाएं...



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