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राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (अंतिम)

अपडेट करने की तारीख: 17 फ़र॰

राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (अंतिम)


जटायु का अंतिम संस्कार करने के पश्चात् राम और लक्ष्मण आगे बढ़ते हैं जहां पंपा नदी के समीप ऋषि मतंग का एक सुन्दर और अलौकिक आश्रम पड़ता है। वहीं पर शबरी नाम की स्त्री एक अलग कुटिया बना कर निवास करती थी। शबरी भीलों के राजा की कन्या थी। वह अपने गुरु मतंग के साथ ही रहा करती थीं और उन्हीं से धर्म और शास्त्रों के ज्ञान को ग्रहण कर उनके प्रिय शिष्यों में से एक हो गईं थी। एक दिन जब ऋषि मतंग का निर्वाण का समय निकट था, शबरी कहने लगी—"गुरुदेव मुझे किसके सहारे छोड़ कर जा रहे, मुझे भी अपने साथ ही ले चलिए।


ऋषि मतंग ने कहा—"नहीं शबरी, अभी तुम्हें एक महत्वपूर्ण कार्य करना है। तुम्हें यहीं रुक कर प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।""प्रतीक्षा गुरुदेव! किसकी?""प्रभु श्री राम की।""प्रभु श्री राम?, क्या उनके आगमन का समय हो गया।""हाँ, शबरी, वह एक दिन वह अपनी भार्या को खोजते हुए तुम्हारी कुटिया में आयेंगे। तब तुम ऋष्यमूक पर्वत पर रहने वाले वन राज सुग्रीव के पास उन्हें भेज देना। वही इनकी भार्या को खोजने में उनकी सहायता करेंगे।"शबरी श्री राम के आगमन को बात सुनकर जड़वत सी हो जाती है। क्या सचमुच ऐसा होगा, राम मेरे द्वार आयेंगे... और मैं उनका दर्शन कर सकूंगी?


अब शबरी के जीवन की बस एक ही अभिलाषा थी कब राम आयेंगे? वह प्रतिदिन राम की प्रतिक्षाएं में पुष्प चुनती और प्रवेश मार्ग पर बिछा देती। न जाने राम कब आ जाए? इसलिए वह यह कार्य प्रतिदिन करती। श्री राम के लिए बेर चुनती और मार्ग पर आंखें बिछा कर बैठ जाती। इस तरह से कई वर्ष बीत गए परंतु शबरी को अपने गुरु के कहे हुए वचन पर पूर्ण विश्वास था। अंततः वह दिन आ ही गया जब राम को माता शबरी की भक्ति को मूर्त रूप देना था और अपने भक्त के अंतहीन प्रेम को सबके समक्ष प्रस्तुत करना था।


राम शबरी आश्रम में प्रवेश करते हैं–"माता! राम प्रेमपूर्ण शब्दों से कहते हैं।"कौन ?""मैं दशरथनंदन राम हूँ। मैं यहाँ माता शबरी से मिलने आया हूँ।"शबरी श्री राम का नाम सुनते ही भाव विभोर हो जाती है। "क्या कहाँ तुमने, तुम राम हो? क्या मेरे कर्ण सही सुन रहे हैं? मुझे कोई भ्रम तो नहीं हो रहा।""नहीं माता मैं ही राम हूँ। मुझे शबरी से मिलना है।""मैं जानती थी मेरे गुरु के वचन मिथ्या नहीं हो सकते, उन्होंने कहा था कि राम अपनी भार्या को खोजते हुए एक दिन अवश्य ही यहाँ पधारेंगे।" बोलते-बोलते शबरी के आँखों से आँसू निकल पड़ते हैं।


वह राम के चरणों पर गिर जाती है। "यह क्या माता आप मुझसे उम्र में बड़ी हो आप मेरे पैर क्यों पड़ती हो।""मुझे न रोको राम मुझे पता है कि तुम कौन हो मेरे गुरु मतंग ने मुझे सब कुछ बात दिया था। मुझे अपना जन्म सफल करने दो। तुम्ही हो जो मेरे सारे कर्मों के शुभाशुभ फलों को नष्ट कर मुझे अपने गुरु के पास नारायण धाम पहुंचा सकते हो।"


शबरी राम का स्वागत करती है और बेर खिलाती है। वह इतनी भाव विह्वल हो चुकी है कि उसमें संज्ञानता शेष नहीं है। वह सोचती है कि कहीं बेर खट्टे न हो इसलिए वह चख-चख कर राम को जूठे बेर खिलाने लगती है। राम भी अपने भक्त के प्रेम का अनुभव करते हुए उसके ही भाव में विलीन हो जाते हैं और वह भी सब कुछ-भूल कर वह जूठे बेर खाने लगते हैं। शबरी उन्हें बताती है कि ऋष्यमूक पर्वत पर राजा सुग्रीव एक निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहें हैं, उनका राज्य उनके बड़े भाई बाली ने हस्तगत कर लिया है, और उनकी पत्नी तारा को भी बंदी बना कर रखा है। वह तुम्हारी सीता की खोज में अवश्य ही सहायता करेंगे।राम अब शबरी से विदा लेते हैं और ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़ते हैं। माता शबरी भी राम का दर्शन करते - करते ही अपने गुरु के धाम प्रयाण करती हैं।

राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम (अंतिम)

पंचवटी तो सदैव की तरह सुगंधित और शांत है, परंतु पंक्षियों द्वारा आकाश में विचरण और पवन के द्वारा वृक्षों के स्पंदन से यह आभास हो रहा था कि यहां का वातावरण शान्त ही नहीं गतिमान भी है, जो कभी भी परिवर्तित हो सकता है। माता सीता के रसोई से आने वाली सुगंध आसपास के वनवासियों, पंक्षियों और कीट-पतंगों सभी को आकर्षित कर रही है; निकट ही लक्षमण भैया राम के लिए पत्थर पर चंदन घिस रहे हैं, और रघुनंदन तो महाकाल के ध्यान में मग्न है।


ऐसे सुंदर और सुगंधित वातावरण में काल ने प्रलयंकरकारी करवट लेने का संकल्प लिया...तभी एक सुंदर राजकुमारी, जिसके नितंबों तक लहराते हुए सुन्दर केश जो श्यामल मेघों का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं, और उसके नेत्र तो ऐसे लग रहे हैं कि मानो समग्र आकाश की विशालता उसके नेत्रों में समा गई हो...वह सुंदर स्त्री आकाश मार्ग से विचरण करती हुई पंचवटी के समीप से गुजरती है। तभी उसकी दृष्टि ध्यान में मग्न तपस्वी राम पर पड़ती है।


"आह! कितना मनमोहक रूप है। इतना सुन्दर पुरुष तो मैंने आज तक नहीं देखा , क्या यह धरती का मानव है या किसी अन्य लोक का स्वामी...मेरा मन तो इसे देखने के पश्चात् मेरे वश में ही नहीं है। मैं इसकी और ऐसे आकर्षित हो रहीं हूं, जैसे एक मधुप कमल को देख कर...ओह! इसका विशाल वक्षस्थल और ये कोमल भुजाएं काश! यह मेरे पास होता, तो मैं ऐसे लिपट जाती जैसे एक बेल विशाल वृक्ष से लिपट जाती है।"


अपने विचारों के आधीन और अपनी कल्पनाओं से प्रेरित वह सुंदर राजकुमारी आकाश की ऊंचाईयों को त्याग कर पंचवटी की धरती पर अपना कदम बढ़ाती है...जैसे ही वह अपने कदमों से धरती को स्पर्श करती है– पंचवटी के शांत और मोहक वातावरण में हलचल-सी हो जाती है। पंक्षियों का वह समुह जो सुगंधित वातावरण से मंत्रमुग्ध हो निडरता से विचरण कर रहा था...अचानक ही पलायन कर जाते हैं; उनके पंखों के वेग बता रहे थे कि काल ने कोई नया इतिहास या किसी नई घटना को आकार देने का निश्चय कर लिया है। राजकुमारी आगे बढ़ते हुऐ रघुनंदन को निकटता से निहारने लगती है।


"हे पुरुषोत्तम तुम कौन हो और किस लोक के राजकुमार हो? अपरिचित सी ध्वनि सुन कर राम अपने नेत्र खोलते हैं और उस सुंदर राजकुमारी को देखते ही राम को समझते देर नहीं लगती कि काल ने अपना चक्र घुमा दिया है। वह लक्ष्मण की ओर मंद मुस्कान के साथ देखते हैं...और उस राजकुमारी को ओर देख कर कहते हैं– "मैं अयोध्या नरेश दशरथ-नंदन राम हूं और वह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है।" वार्तालाप सुनकर जनकनंदनी भी कुटिया से बाहर आ जाती हैं।


राम आगे कहते हैं- "यह मेरी भार्या सीता है।" वह राजकुमारी जनकनंदनी के सौंदर्य को देख कर मन ही मन ईर्ष्या-द्वेष से भर जाती है। राम कहते हैं—"देवी! आपने अपना परिचय नहीं दिया।" वह राजकुमारी क्रोध और हीन भावना से ग्रसित हो बड़े घमंड के साथ कहती है—"मैं उस लंका नरेश... जिसने तीनों लोक को जीत लिया है, जिसने सारे ग्रहों को बंदी बना कर रखा है, मैं उस शिव भक्त जिसने कैलाश को उठा लिया हो...ब्रह्मा से जिसने अमरत्व का वरदान मांग लिया हो, जिसका महल सोने का बना हुआ हो...ऐसे पराक्रमी महाराज रावण की मैं बहन हूं और उस देश की मैं सर्वश्रष्ठ सुंदरी शूर्पणखा हूं।"


इतना लंबा चौड़ा परिचय सुनकर लक्ष्मण को अनायास ही हँसी आ जाती है। राम उसका परिचय सुनने के बाद बड़ी विनम्रता से कहते हैं— "देवी! अपने आने का उद्देश्य कहें, इस छोटी सी कुटिया में आने का आपने कष्ट कैसे किया?" शूर्पणखा अपने घमंड में चूर होकर कहती है—"राम तुम्हें देखते ही मैं तुम्हारे सौंदर्य पर मंत्र मुग्ध हो गई हूं, इसलिए तुम मेरे साथ लंका चलो। वहां मेरा भाई तुमको अयोध्या से भी बड़ा राज्य देकर तुमको क्षत्रपति बना देगा। तुम मेरे भाई को नहीं जानते, वह अपनी बहन के लिए कुछ भी कर सकता है।" रघुनंदन उसके वचन को सुनकर सीता की ओर प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते हैं और मुस्कुराते हुऐ शूर्पणखा से कहते हैं—"परंतु देवी! जैसा कि मैंने आपसे कहा मैं विवाहित हूं और मैंने जीवन भर एक पत्नी-व्रत रखा है, अतः मैं आपके साथ लंका नहीं जा सकता।"


शूर्पणखा द्वेष और ईर्ष्या से जनकनंदनी की ओर देखती है और क्रोध में भर कर कहती है—"यह स्त्री जिसे तुम अपनी भार्या कह रहे हो, इसके सानिध्य में तुम्हें क्या मिलेगा... मात्र इस जंगल का वास और भोजन में यह सूखे पत्ते, तुम मेरे साथ चलो मैं तुम्हें कई तरह के पकवान और सुख प्रदान करूंगी। इस स्त्री में क्या रखा है इसे तो ढंग से श्रृंगार करना भी नहीं आता।" राम काल में छुपे रहस्य और उस स्त्री के छल को देख कर ऐसे मुस्कुराते हैं जैसे वह उस काल की चुनौतियों को स्वीकार कर रहे हो, वह लक्ष्मण की ओर देख कर कहते हैं तुम उस राजकुमार से पूछ लो कदाचित वह तुम्हारे प्रस्ताव को स्वीकार कर ले।


शूर्पणखा लक्ष्मण की ओर देखती है, वह भी यौवन और सौंदर्य में अपने भाई से भी कहीं अधिक सुन्दर था...करोड़ों सूर्य का तेज भी उसके सामने फीका लग रहा था। उसने सोचा यह भी बुरा नहीं है चलो इसी से पूछ लेते हैं। वह बलखाते हुए लक्षण के पास पहुंचती है। "क्यों राजकुमार तुमको मेरा प्रस्ताव स्वीकार है? क्या तुम मुझसे विवाह करोगे?""मैं…मैं कैसे विवाह कर सकता हूं? मैं भी विवाहित हूं और मैंने आजीवन आपने भाई की सेवा का व्रत लिया है, मैं कैसे विवाह कर सकता हूं? भैया राम तो अयोध्या के होने वाले नरेश हैं, उनसे पूछो वह विवाह कर सकते हैं, मैं तो मात्र एक सेवक हूं, एक सेवक तुम्हें क्या सुख दे सकता है?


"शूर्पणखा पुनः राम के पास जाती है और राम उसे पुनः लक्ष्मण के पास भेज देते हैं। कई बार इस तरह उपेक्षा और अवमानना मिलने पर वह समझ जाती है कि यह दोनों मेरे साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। वह क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष से कुरूप होकर सीता पर आक्रमण करने के विचार से आगे बढ़ती है...तभी राम संकेत देते हैं—"लक्ष्मण…", इतना सुनते ही वह अपनी तलवार से शूर्पणखा के नाक-कान काट देते हैं। नाक-कान कटते ही वह अपमान और क्रोध में भर कर वहां से चली जाती है।


दंडक वन में निवास करने वाले अपने भाईयों खर-दूषण के समक्ष क्रोध में भर कर विलाप करने लगती है। तब खर ने १४ राक्षसों का समूह पंचवटी भेजा। परंतु राम ने एक ही बाण से १४ राक्षसों का वध एक ही क्षण में कर दिया। शूर्पणखा यह सब देख कर स्तब्ध रह जाती है और घबराते हुए खर-दूषण को संपूर्ण समाचार सुनाती है।इस बार खर और दूषण स्वयं अपनी समस्त सेना लेकर श्रीराम के आश्रम में पहुँचते हैं। इतनी बड़ी सेना वहाँ आया देख कर लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा - "भैया! प्रतीत होता है कि आपका पराक्रम देख कर भी यह राक्षस  सचेत नहीं हुए। यदि आप आदेश करें तो मैं इनको इनकी स्थिति से अवगत करा दूं...आप आश्रम में भाभी के साथ ही रहें, मैं अभी इनकी पूरी सेना को यमलोक पहुंचा कर आता हूं।" ये सुनकर श्रीराम ने कहा —"लक्ष्मण! तुम अवश्य इन सभी को अकेले यमलोक पहुंचा सकते हो, परंतु मै भी तुम्हारे साथ चलता हूं। देवी सीता तुम आश्रम में ही रहना।"


जब राक्षसों ने श्रीराम को देखा तो एक साथ उन पर टूट पड़े किन्तु उन्हें उन दोनों राजकुमारों की असीम शक्ति का आभास नहीं था। केवल एक प्रहर के युद्ध में ही श्रीराम और लक्ष्मण ने उन राक्षसों का वध कर डाला। पहले खर और फिर दूषण उनके हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए। इतनी विशाल सेना समेत अपने भाइयों का अंत देख कर शूर्पणखा वहाँ से भाग कर सीधे रावण के पास पहुँची।

खर-दूषण को दंड देने के साथ ही राम ने पंचवटी में निवास की अवधि को सार्थक बना दिया और ऋषियों को दिए वचन को पूर्ण किया। जब राम ने दंडाकारण्य में प्रवेश किया था, तब वह क्षेत्र चारो ओर से मायावी और धर्म से भ्रष्ट रक्षसों से भरा हुआ था। पूर्व में वहां अनेक आश्रम थे परंतु सभी आश्रमों में रक्षसों ने आतंक मचा रखा था और बहुत से आश्रमों को नष्ट भी कर दिया था। रघुनंदन राम का वन में निवास करने का मात्र एक ही उद्देश्य था, और वह था कि किस  प्रकार से वह भयभीत ऋषियों और मुनियों और वहां के स्थानीय निवासियों को जो राक्षसों के अत्याचारों से उद्विग्न हो चुके थे, सदा के लिए भयमुक्त करना।वास्तव में देखा जाय तो, रघुनंदन राम ने वन आगमन के समय वस्त्र तो अवश्य गेरुआ धारण किया था, परन्तु शस्त्र साथ में ही रखा था, ताकि वह इन चौदह वर्ष को उद्देश्यपूर्ण बना सके।


कदाचित वह अपने वंश को एक गौरव प्रदान करना चाहते थे ताकि उनके पिता को कैकेई को दिए वचनों से लज्जा का अनुभव न करना पड़े। देखा जाए— दशरथ तो राम को मात्र अयोध्या का सिंहासन देना चाहते थे परंतु  माता कैकेई के माध्यम से वह सम्पूर्ण आर्यावर्त के राजा बन चुके थे। वनागमन से वह सम्पूर्ण जातियों के हृदय के सिंहासन पर विराजमान हो गए थे...अब राम जन मानस के राजा हो गए थे; राज्याभिषेक तो एक औपचारिकता मात्रा ही शेष थी। यदि राम उस समय राजा बन जाते, तो वह मात्र अयोध्या क्षेत्र के ही राजा कहलाते, परन्तु वनागमन ने उनको समग्र आर्यावर्त का ही राजा घोषित कर दिया था।


राम वन आगमन के दायित्व से भलीभांति परिचित थे, जिसे उन्होंने बड़ी गंभीरता के साथ निभाया। उन्होंने राजनीतिक सीमाओं की चिंता किए बिना उन्होंने संपूर्ण भारत वर्ष में धर्म की स्थापना की। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने एक धार्मिक मानचित्र बना रखा हो कि जहां-जहां तक शिव पूजा या ऋषियों का निवास है वह क्षेत्र सुरक्षित रहे और धर्म स्थापित हो। वैसे राम तो पतित पावन रघुनंदन थे जो कोई भी उनके शरण में आता वह सभी को दोष मुक्त और भय मुक्त कर देते थे।                   

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