राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम
- Dr.Madhavi Srivastava

- 6 फ़र॰
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अपडेट करने की तारीख: 17 फ़र॰
पंचवटी वह स्थान है,जहां राम का जीवन एक भयंकर करवट लेता है, जहाँ राम राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम बनते हैं।यही वह स्थान है जहां काल चक्र अपना खेल खेलता है। ऐसा लगता है जैसे काल और महाकाल दोनों ही यहां मंचन कर रहे हो। काल चाह कर भी उस घटना को परिवर्तित नहीं कर सकता था, वहीं महाकाल का हृदय इन सब घटनाओं को देख कर राम की वंदना करने के लिए विवश हो उठता है।
इधर राम सीता के वियोग में अश्रुओं के साथ महाकाल का स्मरण करते हैं, वहीं महाकाल भी समय और प्रारब्ध की विडंबना से विवश हो राम के नाम में ध्यानस्थ हो जाते हैं।पंचवटी ही वह स्थान है जहां जनकनंदनी सीता का जीवन चक्र ऐसे हिचकोले लेता है जो पुनः कभी व्यवस्थित नहीं होता और अंत में उनके पास बस एक ही विकल्प रहता है कि वह अयोध्या को छोड़ कर अपनी माता धरती के गर्भ में सदा के लिए समा जाय।पंचवटी ही वह क्षेत्र है जहां जटायु एक स्त्री की रक्षा कैसे की जाती है, उसका उदाहरण प्रस्तुत करता है और अपना प्राण रघुनंदन के चरणों में त्याग देता है।
रावण के लिए भी पंचवटी उसके अंत का प्रारम्भ स्थल है। यहीं पर उसने अपने अंत का बीज स्वयं अपने हाथों से बोया था और विडंबना भी देखो कि वह स्वयं ही उसे पोषित और पल्लवित भी करता है और उसी के अंत के साथ ही वह बीज विकसित भी होता है।रावण एक साधु के वेश में माता सीता के समक्ष प्रस्तुत होता है। माता के दर्शन के पश्चात तो राम मिलन निश्चित था अब माता का ही दायित्व था कि कैसे एक साधु का मिलन राम से करा दे परंतु राम इस समय समीप नहीं थे वह तो स्वर्ण हिरण के लिए उसके पीछे गए थे। इस स्वर्ण हिरण का निर्माण स्वयं रावण के ही कहने पर हुआ था। एक स्वर्ण ने राम और रावण के मिलन को दूर कर रखा था, इसी स्वर्ण का दहन हनुमान आगे अपनी पूंछ में लगी अग्नि से करते हैं। यहां स्वर्ण एक अंहकार का सूचक है, जब-तक अहंकार का नाश नहीं होगा तब-तक राम-रावण का मिलन संभव नहीं था।
माता सीता के पास अब एक ही उपाय था कि जो अपहरण का प्रारब्ध है वह होने दें। राम तो राम है; पराक्रमी हैं; पतित पावन हैं; वह सीता को अवश्य ही ढूंढ लेंगे और एक भटके हुए रावण के पापों को नष्ट कर राम के नाम में लीन कर देगे, जैसे—अहिल्या, परशुराम और बालि के साथ हुआ था। परंतु इसबार बात रावण की थी, यहां सीता का सहयोग अपरिहार्य था; एक भक्त के उद्धार के लिए सीता को अपना बलिदान देना था।

"हाय लक्ष्मण s s s लक्ष्मण s s s...""सौमित्र यह तो तुम्हारे भाई की पुकार लग रही है।"पुनः एक ध्वनि आकाश और हवाओं को भेदती हुई कुटिया में प्रवेश करती है।"लक्ष्मण s s s...""तुमने सुना सौमित्र ।""हां माता, परंतु आप भयभीत न हो, भैया को कुछ नहीं हुआ, उनको कुछ हो भी नहीं सकता।" सीता विश्वास और भय मिश्रित शब्दो से कहती हैं —"हां, सौमित्र वह तो मैं भी जानती हूं, परंतु मैं नारी शरीर में हूं मुझे स्वभावतः चिंता हो रही है।""वह तो उचित है माता, परंतु मैं विवश हूं भैया ने जाते समय आपकी रक्षा का दायित्व मुझे सौंपा है।"सीता शांत हो जाती है। तभी पुनः एक हृदय विदारक ध्वनि क्षितिज को चीरती हुई व्यथित मन में प्रवेश करती है, इसबार पुकार सीता की थी।"हाय सीता…सीते..."
अब जानकी का धैर्य टूटे हुए मालों के मानकों को तरह बिखर जाता है।"सौमित्र! मैं तुम्हारे भाई की अर्धांगिनी होने के नाते तुम्हें तुम्हारे दायित्व से मुक्त करती हूं, तुम शीघ्र ही अपने भाई का कुशलक्षेम लेकर आओ।""ठीक है माता, जैसी आपकी आज्ञा। मैं आप के लिए यह सुरक्षा कवच का एक घेरा बना देता हूं। आप इसके अंदर सुरक्षित रहेंगी। मैं शीघ्र ही समाचार लेकर वापस आता हूं।"लक्ष्मण उस ध्वनि का पीछा करते हुए आगे बढ़ते हैं। लक्ष्मण को अच्छी तरह पता था कि यह मायावी ध्वनि है। क्योंकि जब से उन्होंने पंचवटी को अपना निवास स्थान बनाया है तब से आए दिन कुछ न कुछ अनहोनी हो रही है। अत्री ऋषि ने पहले ही आने वाले समय की सूचना दे दी थी, और यह भी कहा था कि आने वाला समय बहुत ही चुनौतिपूर्ण और कठिन परिस्थितियों से भरा हुआ है।सुतीक्ष्ण मुनि ने पहले ही यहां बहुत से मायावी दानवों की बात कही थी। वह स्वर्ण हिरण- वह तो अवश्य ही कोई मायावी दानव होगा। भैया ने अवश्य ही अब तक उस हिरण रूपी दानव का वध कर दीया होगा। यह सब सोचते - सोचते लक्ष्मन का मन भारी हो जाता तभी उन्हें श्री राम भैया दिखते हैं।
राम लक्ष्मण को देखते ही अधीर हो जाते हैं —"लक्ष्मण तुम यहां…?"यह वचन सुनते ही दोनों के मन में जानकी की छवि उभर आती है और वह दोनों ऐसे दौड़ते हैं जैसे किसी ने उनका सर्वस्व छीन लिया हो, और उसको वह खोना नहीं चाहते हो। राम समझ चुके थे कि जानकी संकट में है, यह सारा खेल ही उस अनहोनी की ओर संकेत दे रहा था जिसे वह स्वीकार करना नहीं चाहते थे। राम अपनी कुटिया में वापस आते हैं जहां सीता की उपस्थिति के कोई संकेत नहीं थे।राम श्वासों की तीव्रता और प्राणों के डूबते हुए मिश्रित भाव से कहते हैं—"लक्ष्मण जानकी नहीं है। उसका मृत शरीर भी नहीं हैं संभवतः कोई दानव उसे उठा ले गया।"
लक्ष्मण विलाप करने लगते हैं और स्वयं को दोषी मानने लगते हैं—"भैया यह सब मेरा ही दोष है, मैं आपका अपराधी हूं, मैने आप की आज्ञा का पालन नहीं किया। आप मुझे दंडित करे भैया। मैं अपने आप को कभी क्षमा नहीं कर पाऊंगा।"परंतु भैया तो श्री राम थे उन्हें सत्य को स्वीकारने में समय कहां लगता था। सत्य यह है कि अब जानकी अपहृत हो चुकी थी। इसलिए मस्तिष्क को आगे की योजनाओं पर विचार करना था न कि किसी को दोष देना था।"नहीं लक्ष्मण इसमें तुम्हरा कोई दोष नहीं, यह तो नियति थी, जो होना था वह हो चुका। जानकी अब हमारे साथ नहीं है। अब हमें उसे ढूंढना होगा।"पंरतु कहां…? यह प्रश्न दोनों भाइयों को व्यथित तो कर रहा था पर यही प्रश्न उनको आगे के लिए ऊर्जावान भी बना रहा था।



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